गर्मी की छुट्टियां

गर्मी की छुट्टियों का मतलब मेरे लिए होता था किताबों से फुर्सत और ढेर सारा खेल खिलवाड़ | अंतिम परीक्षा के होते ही स्कूल कुछ दिनों के लिए बंद हो जाते और फिर मौज मस्ती का दौर दो महीने तक चलता | 

कुछ दोस्त नाना नानी या  दादा दादी के घर जाने की तैयारी करते तो कुछ दोस्त किसी दूसरे शहर का रुख करते | कुछ दोस्त जिनका गाँव पास में था वो वहां के लिए निकलते पर मेरा गाँव तो मैंने आजतक नहीं देखा इसलिए मेरी छुट्टियां अधिकतर घर पर ही गुजरती | 

घर पर ही रहकर भी मेरी छुट्टियां बहुत ठाठ से कटती थीं | मुझे कहानियों की किताबें और कॉमिक्स पढ़ने का शौक था इसलिए स्कूली किताबों को बंद करते ही ये मेरी नयी दोस्त बन जातीं थीं | सुबह जैसे ही पापा ऑफिस के लिए निकलते मैं साइकिल पर चढ़कर या पैदल ही कॉमिक्स लेने के लिए भाग निकलता | १ रुपये किराया देकर पूरा दिन के लिए कॉमिक्स मिल जाती थी और फिर वो कॉमिक्स न केवल मैं बल्कि मेरे मोहल्ले में रहने वाले मेरे सारे दोस्त भी पढ़ते थे, यानी के एक रुपये का पूरा उपयोग होता था | इसी तरह जब कोई दोस्त कॉमिक्स लाता तो वो भी हम सब मिलकर पढ़ते थे | कभी कभी किसी दोपहर तो हम साथ में एक ही जगह बैठकर टीवी या  फिल्म भी देखने का लुत्फ़ उठाते थे |  

दोपहर में हम लोग  कभी  कैरम खेलते तो कभी व्यापार वाला खेल पर हम दोस्त तब तक खेलते रहते जब तक किसी के घर से कोई बुलाने नहीं आ जाता | इस दौरान जब मम्मी सुबह के काम से फुर्सत पाकर सो रही होती तो हम कभी अपने लिए खूब सारी बर्फ डालकर शरबत बनाते या लइय्या चना लेकर भेलपुरी बनाने में जुट जाते | 

कभी कभी तो दोपहर का समय लम्बा सा लगता था जैसे वो कटने का नाम ही न ले रहा हो | पर कुछ लोग ऐसे भी थे जो दिन के १२ बजे ही वो काम करते जिसके लिए हमे शाम का इन्तजार करना पड़ता था | ये पतंगबाजी के उस्ताद भरी दोपहर में ही अपनी पतंगे ऊँची तान देते थे और हम 'मम्मी के कैदी' नीचे से यही सोचते की इनकी मम्मी अच्छी हैं जो इन्हे रोकती टोकती नहीं  | 

इस दोपहर में जब बिजली गुल हो जाती तो मैं ठंडी ठंडी जमीन पर ही लेट जाता और हवा को महसूस करता | पंखें की तरफ बार बार इस तरह से देखता जैसे मेरी आँखों से निकली कोई दिव्य शक्ति उसे चला देगी पर वो बिजली के अलावा कभी किसी चीज से नहीं चला , हाँ एक बार मैंने उसे डंडे से जरूर चलाया था जब वो जाम हो गया था | इस बीच यदि बाहर 'पों -पों ' का स्वर सुनाई पड़ता तो मैं तुरंत आइस क्रीम लेने के लिए भाग उठता | मम्मी के  लाख मना करने पर भी वो हरी, पीली , लाल  आइस क्रीम मैं चाव से खाता था |

मम्मी जब गहरी नींद में सो जाती तो मैं चुपके से बाहर का ताला खोलकर निकल जाता या घर की दीवार फांदकर बेरी तोड़ने के लिए किसी खाली प्लाट में घुस जाता था | अब आप से क्या कहना की बेर तोड़ने के चक्कर में कैसे कपडे गंदे होते और जगह जगह काँटों से खरोचें आतीं | पर बेरी तोड़कर खाने में मिला सुख , भले ही वो कच्ची हों , इस सब को भुला देता था  

जब  बिजली आ जाती तो हम भाई बहन दूरदर्शन का विशेष कार्यक्रम 'छुट्टी छूट्टी ' मजे से देखते | उसका वो गाना 'हा हा ही ही हो गयी छुट्टी '  आज भी मेरे मन में गूंजता हैं, क्या आपके साथ भी ऐसा होता है |उसमे दिखाया जाने वाला 'सुनो कहानी ' धारावाहिक हम सब बच्चों को प्रिय होता था | शायद जितनी अच्छी बातें मैंने उस सीरियल को देख कर सीखीं उतनी कभी किताबों में नहीं पढ़ीं | 

धीरे धीरे गर्म सूरज भी ठंडा होने लगता और शाम की लालिमा हमे प्यार से पुचकारने लगती | इसी समय 'लटाई (चरखी ) और पतंग' लिए मैं छत पर पहुंच जाता और फिर उसके बाद जो पेंच लड़ते तो रात को ही ख़त्म होते | जब कभी पतंग नहीं होती तो फिर घर के बाहर क्रिकेट का हुल्लड़ होता | गेंद चाहे नाली में जाये या किसी खाली पड़े झाड़ियों से भरे प्लाट में हम उसे ढूंढ ही लाते थे | कई कई बार तो खेलने से ज्यादा गेंद ढूंढ़ने में मजा आया | 

जैसे ही शाम रात में बदलती हम सब बच्चे घर की  ओर भागते क्यूंकि ये पापा के आने का समय होता था | पापा घर आकर स्कूटर खड़ी करें उससे पहले ही मैं अच्छा बच्चा बनकर कुछ न कुछ सरल सा होमवर्क करने बैठ जाता | पापा के सामने पढ़ने का थोड़ा नाटक हमे रात की मस्ती की इजाजत दिलवा देता था | 

रात का खाना खाते ही फिर से आइस-पाइस (लुक्का छुप्पी) या ठप्पो का खेल शुरू होता | बिजली खाना खाते समय या उसके  बाद चली जाती और फिर हम सब बच्चे अपनी धुन में धमा चौकड़ी मचाते | इतना दौड़ने भागने के बाद हम इतना थक जाते की छत पर लेटते ही नींद आ जाती |  छत को पहले ही पानी मारकर दीदी ने ठंडा कर दिया होता था , इसीलिए मैं राजा की तरह पहुँचता और सो जाता | नींद में भी बस यही सपना आता की कल क्या मौज उड़ानी है | बिजली का होना या न होना मेरी नींद में अड़चन नहीं डालता क्यूंकि रात में छत की ठंडी हवा हमे अपने आँचल में सारे सुकून के साथ सुला देती थी | बस ऐसी ही तो होती थी अपनी गर्मी की छुट्टियां | 

*** 


Comments

Popular Posts