जयपुर यात्रा
१)
पढ़ाई और काम काज से कुछ फुर्सत मिली तो सोचा की चलो कहीं आसपास घूम आएं | बहुत दिनों से कहीं बाहर नहीं गए थे और कामकाज से मन और शरीर दोनों थके हुए थे | योजना बनाने से पहले मैंने और मेरी अर्धांग्नी (शीतल) ने बहुत सोच विचार किया , चूँकि यह सप्ताह सभी के लिए अवकाश लाया था इसलिए कहाँ जाया जाये इस पर काफी विचार करना पड़ा | क्रिसमस की छुट्टियां सभी को मनानी थी इसलिए गोवा या कहीं दूर जाना उचित नहीं लग रहा था | ऐसे में हमने दिल्ली के आसपास ही कहीं अच्छी जगह पर जाना तय किया |
इस यात्रा में अकेले जाना थोड़ा काम मजेदार लग रहा था इसलिए हमने साथ में चलने के लिए कई लोगों से आग्रह किया पर कोई भी तैयार नहीं हुआ | फिर रेशी (मेरी बड़ी बहन) से भी पूछा गया, मुझे लग रहा था की जीजा जी को अपने घर लखनऊ जाना है इसलिए वो आ नहीं पाएंगे पर कुछ कारणों से उनका लखनऊ जाना टल गया और फिर वो भी साथ हो लिए | तो इस प्रकार हम 5 लोग यानि मैं , शीतल, रेशी, रोविन जी और चीकू जयपुर के लिए निकल पड़े |
हमने २३ दिसंबर की सुबह ६ बजे अपनी यात्रा शुरू की | रेल व बस के चक्करों को छोड़कर हमने अपनी कार (आल्टो के -१० ) से जाना उचित समझा और फिर सनसनाते हुए रेडियो कॉलोनी से निकल पड़े | इनर रिंग रोड से धौला कुआँ और गुडगाँव पार करते हुए हम जयपुर की ओर रवाना हुए | हाईवे पर इतना ज्यादा जाम था की लगा जैसे पूरी दिल्ली ही भ्रमण को निकल पड़ी है | दिल्ली से लगभग १०० KM की दूरी पर हम फिर से traffic जैम में फंस गए | इतनी बड़ी बड़ी ट्रकों के बीच में हमारी नन्ही सी कार ऐसी लग रही थी जैसे हाथियों के झुण्ड में छोटी सी बकरी | आधा घंटा लगभग जाम में फसे रहने के बाद हम आगे बढ़े |
मानेसर से लगभग ५० KM की यात्रा के बाद यातायात सुगम था और रास्ता भी सुहाना था | दिल्ली में जो अरावली पहाड़ियां शहर के नीचे दब सी गयी हैं वो हमे दिल्ली से लगभग १०० किमी की दूरी के बाद दिखने लगी | ऊँची ऊँची चट्टानी पहाड़ियां रास्ते को और भी मनभावन बनाती हैं | यह खड़ी पहाड़ियां हिमालय जैसी विशाल और हरी भरी नहीं हैं पर फिर भी इनकी सुंदरता देखने लायक है | कहीं कहीं दरारों के मध्य में उपजे पेड़ पौधे इनको कुछ हरियाली देकर सुन्दर बनाते हैं |
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| NH 48 का सुहाना रास्ता |
यहाँ की हवा में ठंडक थी पर दिल्ली जैसी कड़क सर्दी नहीं थी | अच्छा हाईवे होने के कारण हमारी कार आराम से १०० किमी प्रति घंटे की रफ़्तार से चल रही थी | मानेसर के बाद ही हमने एक ढाबे में रूककर कुछ जलपान किया और फिर बिना रुके जयपुर में अपने होटल के लिए बढ़ चले | हमारा होटल सिविल लाइन्स में स्थित 'हवा महल होटल ' था जिसके कमरे बहुत ही सुन्दर थे | इस यात्रा में हमे जाम के कारण लगभग ८ घंटे का समय लग गया और हम अपने होटल करीबन २ बजे पहुंचे |
कुछ देर आराम करने और नहाने धोने के बाद हमने आमेर के किले जाने हेतु कैब बुक करी | २५० किमी गाड़ी चलाने के बाद मैं आराम से घूमना चाहता था इसीलिए अपनी गाड़ी होटल में ही रखकर हम ओला कैब से आमेर की ओर बढे पर शहर के अंदर भी काफी ज्यादा जाम था इसलिए कैब वाले ने हमे आधे रास्ते में ही उतार दिया और फिर हम बस लेकर आख़िरकार आमेर के किले में पहुंचे|
बस से ही हमने रास्ते में पड़ने वाले 'जल महल ' को भी देखा | आमेर का किला काफी बड़ा है और काफी ऊंचाई पर भी स्थित है इसलिए यहाँ काफी सीढ़ियां चढ़ कर ही आना पड़ता है | यह किला तब बना जब जयपुर नाम का कोई शहर ही नहीं था , कछवाहा खानदान के राजाओं ने इसे यह स्वरुप प्रदान किया | इसकी मुख्य कलाकारी और सज्जा राजा मान सिंह (१५५०-१६१४ ईस्वी ) के काल में ही हुई जब अकबर महान के शासन में भारत में नयी नयी इमारतें और कलाएं जन्म ले रहीं थीं | आमेर का किला उस सुनहरे इतिहास का साक्षी है जिसमे मीरा के गीत , तुलसी के दोहे , नानक के शब्द और तानसान के सुर भारत को संगीत से सजाते रहे और महाराणा प्रताप का शौर्य , शिवाजी का तेज , अकबर की सहिषुणता और विजयनगर का ऐश्वर्य इतिहास को नयी दिशा देते रहे |
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| आमेर का किला |
लगभग २०० सीढ़ियां चढ़ने के बाद आप आमेर किले के मुख्या फाटक से भीतर प्रवेश करते हैं जहाँ आपको आगे जाने हेतु टिकट लेना पड़ता है | हमने टिकट की बुकिंग ऑनलाइन ही करा ली थी सो यहाँ पर हमारा समय बच गया | मुख्य फाटक के भीतर एक प्रांगण था जहाँ पर महल के भीतर जाने हेतु एक सुन्दर नक्काशी युक्त द्वार था | इस द्व्वार के अंदर ही दीवाने आम और रानियों के कमरे हैं |
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| मुख्य फाटक के बाद आने वाला दरवाजा |
आमेर के किले में इसकी बारहदरी देखने लायक है , रानियों के कमरे और उनके ऊपर बने झरोखे इस महल की सुंदरता के नमूने हैं | नीचे के प्रांगण में दीवाने -ख़ास पर की गयी कांच की कारीगरी अद्भुत है |
यहाँ पर सफ़ेद संगमरमर में कांच का जड़ाऊ काम किया गया है | साथ में नक्काशी और कलाकृतियों से इसकी रौनक बढ़ती नजर आती है | इसके सामने प्रांगण में स्थित बगीचा ऊपर से देखने में कला का सुन्दर नमूना लगता है |
इस किले के ऊपर से आप जयगढ़ का किला भी देख सकते हैं जो अपनी विशाल मीनार के कारण अलग ही छटा बिखेरता नजर आता है | इस किले के बड़े बड़े दरवाजों में कील नुमा अवरोधक लगे थे , यह कीलें पुराने ज़माने में युद्ध के समय हाथियों द्वारा दरवाजे को टूटने से बचाती थीं | राजपूत अपने युद्ध कौशल के लिए तो विख्यात हैं और ये किला भी अपनी मजबूती के कारण किसी राजपूत के चौड़े सीने जैसा ही लगता है |
इस महल के पीछे राजा मान सिंह का महल है जहाँ से आप जयगढ़ का किला भी देख सकते हैं | सुरंगनुमा रास्तों से होकर आप महल की छत्त तक पहुंचते हैं और यहाँ की अद्भुत कला देख कर विस्मित हो जाते हैं | किले के अंदर एक अजीब सी शांति थी जो कुछ पुकार रही थी | बीते ज़माने के गौरव को खोजती वो शान्ति अनोखी थी , पर वो शांति वहां क्यों थी इसका जवाब ढूंढ़ना था मुझे, ये किला क्या कह रहा है और क्या इसने छुपाया है अपने भीतर ये मेरे अंदर एक प्रश्न की तरह उठ रहा था |
शाम ढल चुकी थी जयगढ़ के किले के पीछे सूर्य अलविदा कह रहा था , लालिमा में चमक उठा किला स्वर्ण नगरी सा लग रहा था | किले के परकोटे पर बने झरोखों और छज्जों से हमने आमेर को एक तरफ देखा और दूसरी तरफ जयपुर को घेरने वाली पहाड़ियां दिख रही थी | अद्भुत संगम था ये सौर्य , सौंदर्य और शांति का |
किले से नीचे उतर कर हमे एक व्यक्ति ने बताया की १०० रुपये की कीमत वाले इस टिकट में जीप से यात्रा भी शामिल है | हम सब जीप में सफर कर के बहुत खुश हुए क्यूंकि ये यात्रा एक किले के भीतर हो रही थी और जीप में सफर करना शायद हम सबका ही बचपन से एक सपना रहा है | जीप से पहाड़ी पर बने इस किले से उतरना बहुत ही रोमांचक था क्यूंकि खड़ी ढलानों से जब भी जीप तेज़ी से नीचे उतरती तो रोंगटे से खड़े हो जाते | जीप के इस सफर से थोड़ी ही देर में हम जोधा बाई के महल में पहुंचे |
जोधा भाई का महल समय की मार का शिकार हो चूका था , शायद जोधा के ससुराल चले जाने पर न तो उसके रिश्तेदारों ने उसपर ध्यान दिया और न ही बाद में सरकार ने | जोधा का कभी आलीशान रहा यह महल खंडहर में बदल चुका है और देखने के लिए अजीब सी शान्ति और ख़ामोशी के अलावा कुछ नहीं था | जीप ने हमे यहाँ पर शायद जोधा महल के बहाने से छोड़ा था परन्तु असली वजह थी वहां पर स्थित राजस्थानी मध्यकालीन उत्पादों की एक विशाल दुकान | वैश्वीकरण के इस युग में यह कहना गलत नहीं होगा की अब यह सामान लगभग पूरे देश में ही इंटरनेट के द्वारा उपलब्ध है | लोग फिर भी यात्रा की यादगार के रूप में इसे ले जाना नहीं भूलते |
२)
जोधाबाई के महल से पुनः जीप में बैठकर हम सब लाइट एंड साउंड शो स्थल पर पहुंच गए | ये स्थल आमेर किले के सामने ही स्थित है और छोटी सी झील जो किले के सामने है उससे यहाँ पर ठण्ड बढ़ जाती है | यहाँ पर दो शो होते हैं पहले ६:३० से ७:३० तक अंग्रेजी में और फिर ७:३० से ८:३० तक हिंदी में | यहाँ की टिकट भी ऑनलाइन बुक कर ली थी इसलिए अब हमे केवल एक घंटा प्रतीक्षा करनी थी | पूरे दिन के इस सफर में हमने केवल सुबह नीमराना पर ही नास्ता किया था उसके बाद से कुछ भी खाने का समय नहीं मिल पाया था | लाइट एंड साउंड शो के टिकट काउंटर के सामने ही छोटी सी कैंटीन थी जहाँ पर पैटीज , बर्गर और कोल्ड ड्रिंक्स उपलब्ध थीं | काफी महंगा होने के बावजूद भी हमने वही पर बैठ कर शाम का नास्ता किया और धीरे धीरे शो का समय हो गया |
लोग काफी उतावले थे और छुट्टियों के कारण भीड़ भी ज्यादा थी, थोड़ी धक्का मुक्की के बाद हम सब उस इमारत की छत पर पहुंचे जहाँ शो के लिए कुर्सियां उपलब्ध थी | लगभग १५०-२०० लोग उस शो को एक साथ देख सकते हैं | हम सबने प्रथम दीर्घा में ही स्थान लिया और बैठ गए | आम तौर पर सिनमा हाल में लोग प्रथम सीट नहीं लेते क्यूंकि वहां से चित्र काफी बड़े दिखते हैं और देखने में भी आनंद नहीं आता पर यहाँ ऐसा नहीं था | पहली पंक्ति भी किले से काफी दूर थी और मेरा विचार था की यहाँ बैठने से कोई भी व्यवधान नहीं होगा |
आजकल मोबाइल के कारण जीवन कुछ सुगम भी हुआ है पर यह भी सही है की इसके कारण असली आनंद लोगों से दूर हो रहा है | मैंने पहली पंक्ति इसलिए भी ली थी क्यूंकि मुझे पता था की लोग मन होने के बाद भी वीडियो और फोटो जरूर लेंगे | इससे मोबाइल के पीछे बैठे व्यक्ति का न केवल ध्यान भंग होगा बल्कि उसका मजा भी आधा हो जायेगा | इस ब्लॉग को पढ़ने वाले सभी पाठकों से अनुरोध है की वह भी यात्रा के समय आनंद उठायें , उसकी फोटो लेकर केवल यादें बनाने में ही न रहें | सच तो यह है की फोटो कितना भी अच्छा क्यों न आये पर यदि आप उस का आनंद नहीं लेंगे तो आप बाद में फोटो देखकर कोई अलग सुख नहीं पाएंगे |
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| आमेर का प्रकाश और ध्वनि शो |
ठीक ७:३० पर शो अमिताभ बच्चन की कालजयी आवाज के साथ शुरू हुआ | घोड़े की टापों की आवाज इतनी वास्तविक लग रही थी जैसे सच में घोड़े दौड़ रहे हों | छत्त पर बैठे हम लोग न केवल आवाज से विस्मित थे बल्कि किले पर नाचती रौशनी अद्भुत छटा बिखेर रही थी | कभी एक मंदिर पर रौशनी होती तो कभी किले के परकोटे पर | रह रह कर महल के ऊपर वाली मंजिल पर से जब प्रकाश किरणें निकल कर आसमान को छूती थीं तो लगता था जैसे किला खुद खुदा की इबादत में सजदे पर बैठा है |
इस शो में केवल कहानी नहीं थी बल्कि इला अरुण जैसी आवाजों से सजा मधुर राजस्थानी संगीत भी था | आसपास की झील से बढ़ी हुई ठंडक के मध्य बैठकर इस संगीत व दृश्य का संगम मंत्र मुग्ध करने वाला था | पूरी कहानी ऐसा लग रहा था जैसे हमारी आँखों के आगे से ही गुजर रही थी | एक भी दृश्य नहीं था पर संगीत ने ही हमारी आँखों में तस्वीरें बना दी थी | कहानी के मध्य तक पहुंचते पहुंचते मुझे उस प्रश्न का जवाब मिल गया जो मेरे मन में मान सिंह महल में उठा था |
| आमेर के परकोटे से जयपुर की झलक |
मेरे मन में प्रश्न था की अजीब से ख़ामोशी क्यों है इस किले में , इसका जवाब इस शो में मिला | इस शो में ही पता चला की १७वीं -१८वीं सदी में राजा जय सिंह ने जयपुर शहर की स्थापना की | यह शहर आमेर से कुछ दूरी पर बनाया गया जो पहाड़ियों से घिरा हुआ था | आमेर के किले की छत से जयपुर का विहंगम दृश्य देखा जा सकता है | पहाड़ियों से घिरा यहाँ शहर सुन्दर है और शौर्य पूर्ण भी | आमेर की उदासी तक शुरू हुई जब उसके बाशिंदे उसे छोड़ कर जाने लगे, उसमे सजने वाली महफ़िलें जब समय में खोने को तैयार थीं , उसके भीतर स्थित मंदिरों की घंटियां जब शांत हो चलीं , चहल पहल वाला यह किला जब वीरान होने लगा, यही वह समय था जब ८०० सालों से खड़ा आमेर का किला इतिहास में खोता चला गया | जयपुर बस गया पर आमेर उजड़ गया, उसके रजवाड़े जा चुके थे उसे समय के थपेड़ों के बीच छोड़कर |
कहानी के अंत में पता चला की सरकार ने आमेर को बचाने के लिए उसे जनता के लिए खोल दिया | जनता के आने से आमेर फिर खिल उठा था , उसके आँगन में चहल पहल फिर थी | अब जब लोग जयपुर आने का मन बनाते हैं तो उनका पहला पड़ाव आमेर ही होता है | आमेर के इस शो से मंत्रमुग्ध होकर हम बाहर निकले कुछ दूर पैदल चलकर पास ही स्थित बस स्टैंड पहुंचे और खाना खाने के लिए एक अच्छे होटल की ओर ऑटो में बैठ चल दिए| रात्रि का भोजन 'खंडेलवाल पवित्र भोजनालय' में कर के हम वापस अपने होटल 'हवा महल' के लिए निकल पड़े | दूसरे दिन तड़के ही अजमेर शरीफ की ओर निकलना था इसलिए होटल पहुंचते ही मैंने स्वयं को नींद के हवाले कर दिया|
3)
सुबह लगभग ५ बजे हम सब नींद से उठ गए और निकलने की तैयारी में लग गए | ७ बजे तक हम सब नाहा धो क तैयार हो कर अजमेर की ओर निकल पड़े | यहाँ मई बताना चाहूंगा की अजमेर को जाने वाले हाईवे पर बीच में बस के लिए कॉरिडोर बना है , मैंने अनजाने में अपनी गाडी उसी कॉरिडोर में चलानी शुरू कर दी , जैसे ही गलती का एहसास हुआ ममई कॉरिडोर से बाहर आ गया | अजमेर तक की सड़क काफी अच्छी है इसलिए हमे कोई ख़ास दिक्कत नहीं हुई | लगभग ५५ किमी के बाद हम नाश्ते के लिए एक होटल में रुके जो महंगा था परन्तु खाने की गुणवत्ता काफी अच्छी थी | यहाँ से लगभग १ घंटे के सफर के बाद हम अजमेर में थे | अजमेर में हमने सीधे दरगाह शरीफ की ओर रुख किया |
दरगाह पहुंच कर हमने एक होटल में कार पार्क की और दरगाह की ओर पैदल ही रवाना हुए | दिल्ली गेट वाली जगह पर ही कार पार्क करना बेहतर है क्यूंकि इसके बाद सड़क थोड़ी पतली होती जाती है और भीड़ बढ़ जाती है | यहाँ से लगभग ७००-८०० मीटर चलने पर आप दरगाह के मुख्य द्वार पर पहुंचते हैं | रास्ते में दोनों तरफ राजस्थानी सामान और बच्चों के खिलौनों की दुकाने हैं | आप दरगाह के मुख्य द्वार के पहले भी जूते चप्पल उतार कर किसी दूकान में रख सकते हैं और दरगाह के मुख्या द्वार के भीतर भी एक स्टैंड हैं | हमने अपने जूते अंदर स्टैंड में रखे और हाथ मुँह धोकर मुख्य दरगाह की ओर बढ़े |
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| दरगाह का मुख्य द्वार |
थोड़ी ही देर में हम दरगाह के अंदर जाने वाली लाइन में शामिल हो गए थे | दरगाह के बाहर स्वर्णिम दीवारें हैं जो एक मनमोहक दृश्य बनाती हैं| लगभग आधे घंटे के बाद हमने दरगाह के भीतर प्रवेश किया | वहां बहुत संख्या में लोग मौजूद थे पर फिर भी इत्र व गुलाब की महक से दरगाह सुकून भरी थी | हमने अपने प्रसाद की डलिया वहां बैठे मौलवी को दी और उन्होंने फूल दरगाह पर चढ़ा कर हमे वो वापस कर दी | यहाँ कुछ लोग गलत रास्ते से भी दरगाह के भीतर आने की कोशिश करते हैं जिसके कारण भीड़ बहुत बढ़ जाती है | लोगों से मेरा निवेदन है की दरगाह जैसी जगहों पर यदि दर्शन हेतु कुछ विलम्ब हो भी जाये तो इसे ईश्वर की मर्जी समझ कर स्वीकार करना चाहिए |
दरगाह में माथा टेक कर हम लोग बाहर निकले और कुछ देर पवित्र जल वाले कुंड के पास बिताया | उपासना का सही अर्थ यही है की आप ईश्वर के पास बैठे , मन ही मन अपना सन्देश उन तक पहुचायें | सच यही है की ईश्वर के पास बैठ कर शांति की अनुभूति ही सभी तीर्थ यात्राओं का मर्म है, इसके बिना आप दर्शन करके भी प्यासे रह जाते हैं | इसलिए हमने भी दरगाह के समीप बैठ कर कुछ देर वहां के माहौल को स्वयं में समा लिया| आप शांत चित्त के द्वारा ही एक रूहानी आनंद को समझ सकते हैं | यहाँ आकर रूह तो शांत हो हो जाती है और यहाँ का माहौल आपको एक अलग ही दुनिया की सैर करता है | ईश्वर से एक हो जाना ऐसे ही संभव हो सकता हैं |
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| दरगाह का प्रवेश द्वार और स्वर्णिम भित्तियां |
दरगाह से बहार आकर हमने बड़ी देग भी देखी जिसे अकबर ने समर्पित किया था इसमें लगभग ४८०० किलो प्रसाद एक साथ बनाया जा सकता है | साथ में ही छोटी देग भी थी जिसकी क्षमता २४०० किलो है | परन्तु मुझे यह देख कर दुःख हुआ की लोग इन देगों में भी पैसों का चढ़ावा डालते हैं , इन देगों का उद्देश्य है खाना तैयार करना , मेरी समझ में इसमें पैसे डालकर इसका महत्व कम नहीं करना चाहिए | देगों से उतरकर हमें होटल की ओर रुख किया जहाँ हमने कार पार्क की थी | यहाँ के बाद हमे पुष्कर की ओर निकलना था |
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| बड़ी देग |
४)
पुष्कर की ओर जब हम रवाना हुए तो रास्ते में हमने आनासागर झील देखि , पुष्कर की ओर जाने वाली सड़क इस झील के किनारे किनारे ही साथ चलती है | पुष्कर जाते हुए इस पूरी झील का एक चक्कर हो ही जाता है | यह झील देखने में बहुत ही सुन्दर थी परन्तु समय की कमी के कारण हम वहां रुक नहीं पाए | पुष्कर की ओर बढ़ते हुए हम जल्द ही पहाड़ी रास्तों पर पहुंच गए और यहाँ पर गाड़ी चलने का अपना अलग ही रोमांच था | ऊँची ऊँची ढलानों से उतरती कारों व बसों के सामने अपनी गाड़ी को आगे बढ़ाना एक अलग ही रोमांच पैदा करता है|
पुष्कर की ओर बढ़ते हुए हम कुछ देर सांझी छत पर रुके , यह एक पहाड़ी पर स्थित है और यहाँ से आप पुष्कर की एक हलकी सी झलक देख सकते हैं | इस छत से बहुत ही सुन्दर नजारा सामने दिखता है जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता | यहाँ से आपको घाटी में बसा एक सुन्दर सा शहर नजर आता है और पहाड़ों से छूकर आती ठंडी हवा आपका स्वागत करती है |
यहाँ से लगभग १ घंटे की यात्रा के बाद हम अपने होटल 'पुष्कर हेरिटेज' पहुंचे , यह होटल पहाड़ के सामने ही बना हुआ है और रंग बिरंगे फूलों से सजा भी है | यहाँ कुछ देर रुक कर हमने आराम किया और स्वयं को अगली यात्रा के लिए तैयार किया | यहाँ मैं बताना चाहूंगा की यह यात्रा अपने आप में ही इतनी सुखमय थी की मुझे १५० किमी गाड़ी (आल्टो के 10 ) चलाने के बाद भी थकान का अनुभव नहीं हो रहा था , कुल मिलकर अब तक मैं ४०० किमी गाड़ी चला चुका था पर थकान का कहीं नाम नहीं था |
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| सावित्री देवी मंदिर |
३:३० अपराह्न हम सावित्री देवी मंदिर के लिए रवाना हुए , यह मंदिर होटल से कुछ ही दूरी पर एक पहाड़ी पर स्थित था | रास्ते में हमने कई साड़ी ऊँट गाड़ियां देखी , सैलानी राजस्थानी परिवहन का लुत्फ़ उठा रहे थे , यह ऊँट गाड़ियां मंदिर तक ही जा रही थीं | इस मंदिर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों का रास्ता है परन्तु एक साल पहले ही यहाँ पर रोप वे की भी स्थापना की गयी है | हमने रोप वे का टिकट लिया और प्रतीक्षा की पंक्ति में खड़े हो गए | यहाँ पंक्ति से भी नीचे का विहंगम दृश्य दिख रहा था इसलिए कैसे १ घंटा निकल गया पता ही नहीं चला |
कुछ देर बाद हम ट्राली में थे जो रोप वे पर ऊपर जाती है , इसमें ६ लोग आराम से बैठ सकते हैं और यह पूर्ण रूप से बंद भी रहती है जिससे नीचे गिरने का कोई भी खतरा नहीं रहता | बीच रास्ते में ट्राली लगभग १ मिनट के लिए रोक दी जाती है जिससे लोग नीचे का नजारा देख सकें |
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| रोप वे |
ऊपर पहुंचकर हमने देखा की पहाड़ियों के बीच बसे पुष्कर का अलग ही नजारा दिख रहा है | इस पहाड़ी से पुष्कर के मुख्या सरोवर के भी दर्शन हो जाते हैं और साथ ही अजमेर से आती हुई सड़क भी दिखती है | यहाँ की ठंडक भी बहुत ही सुखदायी थी , पश्चिम की तरफ ढलता सूरज आसमान में अलग ही लालिमा बिखेर रहा था | आसमान से उतरती रात नीचे के नज़ारे को और भी सुन्दर बना रही थी |
ट्राली से उतर कर कुछ ही दूरी पर माता का मंदिर है | यहाँ दर्शन करने के बाद कुछ वक्त हमने मंदिर की सामने बने प्रांगण में गुजरा जहाँ से पूरा पुष्कर चमकते मोती जैसा दीखता है | सामने की चट्टान वाली पहाड़ियां अलग ही आनंद देती हैं , यहाँ की ठंडी हवा मन को तारो तजा करने वाली थी और ऐसा लग रहा था जैसे समय कुछ ठहर सा गया है | पता ही नहीं चला कब वहां पर ७ बज गए और फिर हमने पुष्कर की तरफ प्रस्थान किया | मंदिर के बाहर हु हमने कुछ जलपान किया क्यूंकि सुबह से हमने केवल नाश्ते पर ही पूरा दिन बिता दिया था |
लगभग ८ बजे हम ब्रह्मा मंदिर पहुंचे जहाँ पर पुष्कर का मुख्या सरोवर भी स्थित है| यहाँ पहुंचते पहुंचते शांति सर्वत्र हो चुकी थी और रात ने चमकती रौशनियों का श्रृंगार कर लिया था | ब्रह्मा मंदिर में दर्शन के उपरान्त हम मुख्य सरोवर पहुचें और वहां की अद्भुत शान्ति ने हमको मोहित कर लिया | मन यही कर रहा था की इस सरोवर के समीप ही बैठे रहो , यहाँ तन और मन दोनों ही शांत थे और हलकी ठंडी हवा थकान को उड़ा ले जा रही थी | सरोवर में मिला रात का सांवलापन उसकी खूबसूरती को चार चाँद लगा रहा था और ठंडा पानी हवा को एक महक से घोल रहा था | आसपास के मंदिरों से उड़ कर आती धुप और कपूर की महक से यह सरोवर जीवंत तीर्थ सा प्रतीत होता है| हमारे मन में यह प्रश्न था की इतने लोग यहाँ क्यों यात्रा पर आते हैं | सबके उत्तर अलग अलग होंगे पर मेरे लिए मन की यह शांति ही मेरा उत्तर बन गयी थी |
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| पुष्कर का सरोवर: रात में |
पुष्कर की इस रात में हमने अपनी यात्रा का दूसरा रात्रि भोजन किया जो काफी तीखा था | राजस्थान अपनी मिर्चियों के लिए विख्यात है और वह हमने इस खाने में साक्षात् अनुभव कर लिया था | लहसुन की चटनी हमने माँगा तो ली पर एक बार जरा ही चखने के बाद वह किसी के गले नहीं उतरी | वह इतनी तीखी थी की हमे लस्सी पीकर तीखापन मिटाना पड़ा | इस प्रकार पुष्कर की यह यात्रा ख़त्म हुई और अगले दिन हम लोग वापस जयपुर की ओर निकलने वाले थे|
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पुष्कर से निकलने के पहले हम चाहते थे की पुष्कर की इस अनुपम छटा को स्वयं में बटोर लें | इसलिए मैं और शीतल होटल की छत से शहर का नजारा देखने गए| यह होटल पहाड़ों के बीच में स्थित था और यहाँ से आप दूर तक का नजारा देख सकते हैं | मेरे पास दूरबीन भी थी जिससे मैंने पीछे वाली पहाड़ पर स्थित मंदिर को भी देखा और अगल बगल के बागों में तोते और मोर जैसे पक्षियों को भी देखा | यहाँ का नज़ारा हमारी दिल्ली से बिलकुल अलग था , ऐसी शांति और शीतलता की कल्पना भी आप दिल्ली भी नहीं कर सकते | यहाँ की हवा में भागदौड़ और बेचैनी नहीं थी बल्कि यहाँ सुकून था आराम था और मन में स्थिरता थी |
मैंने दूरबीन से ही उस छत से सावित्री देवी मंदिर को पुनः प्रणाम किया , ऊँची पहाड़ी पर स्थित होने के कारण यह मंदिर दूर से ही देखा जा सकता है | मैंने यह भी देखा की सामने वाली छत पर कुछ विदेशी (सम्भवत: यूरोपीय ) सूर्य नमस्कार सीख रहे हैं | होटल के पीछे जो पहाड़ी थी सूर्य धीरे धीरे लालिमा बिखेरता हुआ वहां से प्रकट हुआ | अरुणिमा से धुला आकाश नयेपन से भरा था , जिंदगी में कुछ ठहराव होना भी जरूरी है यह मैंने पुनः अनुभव किया | लगभग २-३ घंटे ऐसे ही होटल में स्वच्छ वायु का आस्वादन करने के बाद हमने निकलने की तैयारी की |
पुष्कर से अजमेर और अजमेर से जयपुर का सफर लगभग २:३० घंटे में पूरा हुआ और ३-४ बजे हम हवा महल के समीप थे | यहाँ की एंट्री टिकट भी हमने ऑनलाइन ले ले थी जिसके कारण हम अनावश्यक विलम्ब से बच गए | अंदर मैंने देखा की हवा महल की ऑडियो गाइड भी उपलब्ध है , मैंने १५० रुपये जमा करके यह ले ली | इसके द्वारा आप चिन्हित जगहों पर जाकर उस जगह का ऑडियो क्लिप सुन सकते हैं | बड़ी ही सरल भाषा में यह गाइड आपको उस जगह का परिचय देता है तथा उसका महत्व समझाता है |
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| हवामहल |
हवा महल जयपुर के भव्य स्मारकों में से एक है , ऊपर के मंदिर में सबसे आकर्षक था रंगीन कांच से जमीन पर पड़ने वाली किरणें | इससे यहाँ पर रंग बिरंगी रौशनी होती है जो देखने में बहुत आकर्षक लगती है | साथ ही यहाँ पर झरोखे की जालियां इस प्रकार की बानी हैं की यहाँ पर बैठने वाली रानियां नीचे प्रांगण हो रहे उत्सव को साफ़ साफ़ देख सकती थीं परन्तु उन्हें नीचे से कोई भी देख नहीं सकता |
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| रंगीन कांच से चमकता हवामहल |
पिरामिड आकर का यह हवामहल जयपुर के सुन्दर दृश्य दिखता है | ऊपरी मंजिल जो की काफी पतली है वहां से आप नाहरगढ़ का किला देख सकते हैं , जयपुर के बेहतरीन शहर संरचना यही से समझी जा सकती है| राजा जय सिंह का बनाया हुआ जयपुर और उसकी भव्यता को आप यहाँ से निहार सकते हैं | हवा महल से निकलकर हम पार्किंग में पहुंचे जहाँ हमने कार पार्क की थी , यह पार्किंग हवा महल के पीछे ही स्थित है इसलिए ज्यादा पैदल नहीं चलना पड़ता | एक ख़ास बात जो महल के पीछे वाली गली में दिखी वो थी बहुत सारे कबूतर जो एक साथ दाने चुग रहे थे | हलकी सी आवाज पर ही वह उड़ते और पूरे आसमान को भर देते | थोड़ी ही देर में वह फिर आते और लोगों द्वारा डेल गए दाने खाने लगते|
हवा महल से अब हमें अपनी यात्रा के आखिरी चरण की ओर बढ़ना था , अब तक की मजेदार यात्रा में यह अंतिम पड़ाव सबसे ज्यादा मनोरंजक होने वाला था | अब हम जा रहे थे मशहूर 'चोखी ढाणी ' रेस्टोरेंट में , यह एक रेस्ट्रॉन्ट न होकर बल्कि स्वयं में ही एक अद्भुत मनोरंजक स्थल है | यह आजकल के थीम पार्क्स या वाटर पार्क्स के जैसा ही विशाल है परन्तु यहाँ का आनंद अलग है , उसमे राजस्थानी खाने के साथ साथ राजस्थानी अंदाज भी है |
| चोखी ढाणी का मुख्य द्वार |
यहाँ की टिकट ९०० रुपये प्रति व्यक्ति के हिसाब से मिली , कुल ३६०० रुपये में हम ४ लोग अंदर पहुंचे | अंदर पहुंचकर ही माथे पर तिलक लगा कर हमारा स्वागत हुआ , यहाँ से ही राजस्थानी परमपराओं की एक सुन्दर झलक मिलने लगती है | अंदर पहुंचने पर हमने देखा की हम जैसे राजस्थान के किसी एक गाँव में खड़े हैं जहाँ मेला लगा हुआ है | कहीं कठपुतली का नाच था तो कहीं नट रस्सी पर चलने वाला करतब दिखा रहे थे |
अंदर विश्राम हेतु जगह जगह पर झोपड़ी-नुमा स्थल भी थे , चारो और चूल्हे से आने वाली महक सर्द हवा में घुली हुई थी | रंग बिरंगे नज़ारे और उनके बीचे में चहकते हम जैसे लगभग ९००० पर्यटक कौतुहल और उल्लास से एक अलग ही समा बना रहे थे | हमने कुछ देर झोपड़ी में पड़ी चारपाई पर विश्राम किया और फिर टहलने निकले | सामने ही नगाड़े की थाप पर लोग नाच रहे थे , नगाड़े की आवाज पूरे वातावरण में जोश सा भर रही थी |
शीतल ने भी इसी बीच राजस्थानी लोक नृत्य का लुत्फ़ उठाया और सर पर राजस्थानी पगड़ी बाँध कर निरत्यांगना के साथ मग्न होकर नृत्य किया | पास भी एक बड़ा सा घंटा था जिसे जोर लगाकर हम सबने बजाया , उसके पीछे बैलों की नकली विशाल जोड़ी पर बैठकर हमने खूब फोटो खिचवाये | कठपुतली का नजारा देखा और मुँह से आग उगलने का करतब भी देखा | जगह जगह पर अलग अलग राजस्थानी नृत्य हो रहे थे जहाँ आगंतुक भी सब कुछ भूल कर खुल कर नाच रहे थे | पूरा समा राजस्थानी संगीत से भरा हुआ था | घूमर का संगीत सभी को लुभाने वाला था |
कुछ ही देर में हमने ऊंट की सवारी का भी आनंद लिया| ऊंट पर बैठने में दर भी लगता है क्यूंकि जब यह आपको लेकर खड़ा होता है तो यही लगता है की आप कहीं फिसल कर गिर न जाएं | पर ऐसा कुछ हमारे साथ नहीं हुआ और लगभग १ मिनट की छोटी सी सफारी में हमे काफी मजा आया | इसके बाद हमने हल्दी घाटी का युद्ध स्थल स्मारक देखा , उसके अंदर बना सरोवर देखा और वहां पर स्थित मंदिर में हो रही आरती में भी शामिल हुए |
हल्दी घाटी स्थल पर विभिन मूर्तियों द्वारा उस शौर्यपूर्ण युद्ध को जीवंत किया गया है | एक मूर्ति में घोड़े के सिर पर हाथी का सिर देख कर हम थोड़ा अचंभित थे |वहां के एक कर्मचारी ने बताया की हल्दी घाटी के इस युद्ध में राजा मान सिंह हाथी पर बैठे थे और राणा प्रताप के पास केवल घोड़ा था | घोड़े के इस सिर पर हाथी के बच्चे का नकली मुखौटा लगाया गया जिससे मान सिंह का हाथी इस घोड़े को हाथी का बच्चा समझ कर वार न करे | एक अलग मूर्ति में प्रताप द्वारा खायी जाने वाली घास की रोटी का भी वर्णन मिलता है | चोखी ढाणी का यह स्थल मुझे बहुत ही मनभावन लगा |
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| हल्दी घाटी : घोड़े के सिर को धयान से देखें |
आगे शीतल ने कुम्भकारी भी सीखी तथा एक छोटा सा बर्तन भी कुम्हार के साथ बनाया , वहीँ पास में कबीलाई नृत्य हो रहा था जहाँ एक नृतक मोर बना हुआ था | उसके हाव भाव और नृत्य देख कर हमे बहुत मजा आया , उसकी भाव भंगिमा सच में एक मोर जैसी ही प्रतीत हो रही थी | फिर वहां पर लगी राजस्थानी सामान की दुकानों को भी हमने देखा जहाँ मुझे घड़ियों की दूकान काफी विस्मय भरी लगी | वहां तरह तरह की बड़ी बड़ी घड़ियाँ मौजूद थीं जैसी मैंने सिर्फ हैदराबाद के सालार जंग म्यूजियम में ही देखी थी |
इसके बाद हमने वहां राजस्थानी खाने का लुत्फ़ उठाया | हमें दाल बाटी , चूरमा , कैर सांगड़ी की सब्जी , सरसों का साग , मक्के की रोटी , कढ़ी , चावल , खिचड़ी , गट्टे की सब्जी , और बादाम के हलुवे जैसे स्वादिष्ट व्यंजन खाने को मिले | वहां पर खाना परोसने वाले व्यक्ति राजस्थानी परिधान में था और बड़ी ही मान मनुहार के साथ हँसते हसाते खाना खिला रहे थे | भोजनालय के भीतर भी एक गाँव जैसी ही आभा थी , मद्धिम रौशनी और भित्तियों पर गोबर का लेप | इससे अच्छा माहौल शायद राजस्थानी खाने के लिए नहीं बनाया जा सकता | चोखी ढाणी का यह अनुभव भी अनूठा ही था |
हम यहाँ ७ बजे आये थे और देखते ही देखते ही ११ बज चुका था , सर्दी बढ़ती जा रही थी और हमे अब यहाँ से विदा भी लेनी थी | हमारा होटल यहाँ से लगभग २० किमी की दूरी पर था और इसलिए न चाहते हुए भी अब हमे यहाँ से विदा लेनी पड़ रही थी | एक घंटे के बाद हम होटल में थे और थकान के कारण जल्दी ही सो गए | अगले दिन सुबह १० बजे हम दिल्ली की लिए वापस निकले और लगभग ३ बजे अपने घर मुख़र्जी नगर पहुंच गए |
यात्रा इस प्रकार आनंद और रोमांच भरी रही , हमने भागने के बजाये रुक रुक कर एक एक स्थल को अच्छे से समझा, जाना और उसका आनंद लिया | हालांकि हम जयगढ़, नाहरगढ़ नहीं जा पाए पर जितनी भी जगह हम गए वहांहमने खूब मजे किये | जरुरी यह नहीं की आप कितनी जगह जाते हैं, जरुरी यह की जहाँ भी आप गए वहां आपने सुकून पाया या नहीं | हमने अपनी इस ३ दिन की यात्रा में सुख, शांति और आनंद तीनों को पाया | यह यात्रा सदैव में मन मास्तिष्क़ पर अपनी सुनहरी यादें बनाये रखेगी | पाठकों से भी निवेदन है की वह भी जयपुर जाएँ और राजस्थान का आनंद लें |
*समाप्त*














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