Mera school

मेरा स्कूल 

१) 
हर बच्चे को अपना पहला स्कूल बहुत ही प्यारा होता है और यदि उसने अपने जीवन के १३ साल एक ही स्कूल में बिताएं हों तो वो स्कूल उसके लिए जिंदगी का अहम् हिस्सा ही बन जाता है | यही किस्सा है मेरा और मेरे स्कूल 'राहुल मेमोरियल इंटर कॉलेज ' का | मैंने अपने जीवन के १३ साल यहीं पढाई की , अपनी जिंदगी के सबसे अच्छे दिन यहीं बिताएं, बहुत सारी  मीठी यादों के साथ बहुत ही अच्छे दोस्त भी बनाये और न केवल परीक्षाएं पास कीं बल्कि जिंदगी के सही मायनों को भी समझा | मेरे स्कूल ने ही मुझे एक अच्छा इंसान बनना सिखाया और जिंदगी जीना सिखाया |

बात १९९२ की है जब ४ वर्ष की उम्र में मेरा  'राहुल इंग्लिश स्कूल ' में दाखिला कराया गया | पहले पहल पापा चाहते थे की मैं 'सेंट थॉमस' जैसे बड़े स्कूल में पढूं और मेरा दाखिला भी वहां हो ही चुका था परन्तु भाग्य में कुछ और ही लिखा था | पापा 'सेंट थॉमस' के प्रिंसिपल से बात करके लौट ही रहे थे की उनके एक सहकर्मी 'श्री लक्ष्मीकांत पांडेय' जी उन्हें मिल गए और उनसे कहा की मेरा दाखिला उनके स्कूल में कराया जाये | श्री लक्ष्मीकांत पांडेय जी ही राहुल स्कूल के मुख्य संस्थापक थे , उन्होंने अपने दिवंगत पुत्र श्री राहुल पांडेय की स्मृति में इस स्कूल का निर्माण कराया था | इसी स्कूल की एक और शाखा किदवई नगर में भी थी जिसका नाम 'राहुल मेमोरियल इंग्लिश स्कूल था '|

पापा को यह बात कुछ अच्छी लगी क्यूंकि स्कूल इंग्लिश माध्यम था और घर के नजदीक भी , साथ ही यह बात भी थी की उनके सहकर्मी के स्कूल में किसी बात की अन्यथा दिक्कत नहीं आएगी | इस प्रकार घर के नजदीक ही वाइट हाउस के पास स्थित 'राहुल इंग्लिश स्कूल' में मेरा दाखिला कराया गया | १९९२ के मार्च में पहली बार मैंने स्कूल में कदम रखा |

स्कूल के मुख्य द्वार पर एक बड़ा सा फाटक था जिसके ऊपर इंद्रधनुष की आकृति वाले बोर्ड पर स्कूल का नाम बड़े बड़े शब्दों में लिखा था | इस बड़े फाटक के बायीं ओर एक छोटा  दरवाजा था जिससे हम अंदर जा सकते थे | इस छोटे दरवाजे पर एक गोरखा पहरेदार पहरा देता था जिसके डर से मैं स्कूल से बाहर नहीं निकल पाता था | इससे पहले मुझे दीदी के स्कूल भेजा गया था पर बीच में ही मैं स्कूल से भाग निकलता  था और पंक्चर की दूकान पर हवा भरते हुए नाचता  था | एक बार पापा ने ऑफिस से आते हुए मुझे देख लिया और अपने साथ घर ले आये , शायद तभी उन्होंने ये फैसला किया की इससे किसी पहरेदार वाले स्कूल में भी भेजना होगा |

२) 

उस समय हमारा स्कूल ज्यादा बड़ा नहीं था | लगभग १० कमरों में क्लासें चलती थीं और पीछे की और हमारे स्कूल के प्रबंधक और श्री लक्ष्मीकांत अपने  सुपुत्र श्री कौत्स (राजन ) पांडेय  व अपने परिवार के साथ रहते थे | फाटक के पीछे एक छोटा सा मैदान था जिसमे हम लोग लंच के समय विष-अमृत जैसे खेल खेलते थे | इस मैदान के बगल में एक उद्यान था जिसमे आम, पपीता, अमरुद आदि के पेड़ लगे हुए थे | उद्यान के पीछे श्री राजन का एक छोटा सा कमरा था | इस उद्यान के दूसरी ओर एक कोठरी बनी थी | मेरे पापा ने मुझे डराने के लिए कहा था की इस स्कूल में जो शैतानी करता है उसे  भालू की कोठरी में बंद कर देते हैं | मुझे कई वर्षों तक यही लगता रहा की उद्यान के पीछे जो कोठरी है उसमे भालू रहता है |

कक्षा के भीतर छोटी छोटी बेंचें हुआ करती थीं | छोटी बेंच पर तीन बच्चे बैठते थे और बड़ी बेंच पर बस्ते / किताबें / कापियां रख कर पढाई की जाती थी | क्लासरूम ज्यादा बड़े नहीं थे पर बड़ी बड़ी खिड़कियों के कारण हवादार थे | इनमे दरवाजों की जगह चिक लगी हुई थी जिसे हम अक्सर तोड़ा करते थे | सामने की ओर ब्लैक बोर्ड होता था जिसे कालिख पोतकर एकदम काला रखा जाता था |

बहुत बार ऐसा होता की टीचर हम बच्चों को 'हेड डाउन' करके बैठने को बोलती थीं, मैं सिर नीचे  करके भी इधर-उधर नजरें दौड़ाया करता था | कभी स्कूल के बाहर लगे 'युक्लिप्टस' के पेड़ों को हवा में झूमते देखता तो कभी कमरे के पंखे की चर -चर वाली आवाज को मग्न होकर सुनता |

मुख्य फाटक के बगल में  ही वो चीज थे जो मुझे सबसे अच्छी लगती थी , हमारे स्कूल के घंटी | एक लम्बे से खम्बे से टंगी हुई लोहे की यह घंटी जब भी बजती हमे यही लगता की हम छुट्टी के और करीब आ गए हैं | लंच में जब घंटी एक साथ देर तक बजायी जाती तो हमारे दिल भी उछलते थे , पर लंच के अंत की घंटी कभी अच्छी नहीं लगती थी | वो टन -टन  की आवाज मन को किसी  भी संगीत से ज्यादा मोहती थी |

हमारे स्कूल में फाटक के बायीं ओर ही प्रिंसिपल का ऑफिस था जहाँ मैंने पहली बार ग्लोब देखा था | इस ऑफिस के बाहर ही २ झूले लगे हुए थे जिसमे हम लंच के समय और छुट्टी के समय बस का इन्तजार करते हुए झूलते थे |

३)

हमारे स्कूल की एक मिनी बस  भी थी  हलके हरे रंग की , मैं इसी बस से स्कूल आता -जाता था |  हलके हरे रंग की हमारी बस में ज्यादा से ज्यादा ३० बच्चे ही आ सकते थे |  उस पर भी  हमेशा यह होड़ लगी रहती की खिड़की वाली सीट पर कौन बैठेगा  और उससे भी ज्यादा यह की ड्राइवर अंकल के बगल वाली सीट किसकी होगी | इस बस से ही मैंने यशोदा नगर और उससे बाहर  की ऐसी बहुत सी जगहें देखीं जिनसे मैं वाकिफ नहीं था | मैंने बस की यात्रा से ही जाना की कानपूर में एक बम्बा(नहर) भी है जहाँ बच्चे नदी की तरह ही नहाते हैं | यह बम्बा (नहर ) हमारे स्कूल से लगभग ४ किमी दूर बसंत विहार में बहता था और जहाँ पास में भी एक हनुमान मंदिर  और प्रसिद्ध चतुर्वेदी बिल्डिंग भी थी |

कभी कभी जब यह बस कहीं पंक्चर हो जाती या कीचड़ में धंस जाती तो हम बच्चे खूब मजा करते थे | जितने देर में पंचर बनता या कीचड़ में फांसी बस बाहर खींची जाती तब तक तो हम होमवर्क की चिंता से दूर खूब मजा करते | एक दो घंटे के समय में ही हम दुनिया भर के ख्वाब सजा लेते , कभी हम मिटटी में ही विक्रम बेताल खेलते तो कभी हम खुद सुपरमैन बनकर बस को बाहर खींचने की सोचते | इस उधम में कपड़ों की जो हालत होती वो तो धुलाई से ही समझ आती थी , एक धुलाई  कपड़ों की होती और दूसरी हमारी |

धीरे धीरे समय बीतता गया पुराने कुछ दोस्त स्कूल छोड़ कर चले गए और कुछ नए दोस्त बहार से आ गए | हमारा स्कूल भी धीरे धीरे बढ़ने लगा | पीछे की ओर बिल्डिंग बढ़ने लगी और उद्यान के पीछे वाली जगह पर हिंदी माध्यम स्कूल खोला गया जिसका नाम था राहुल विद्या मंदिर| अब हमारे स्कूल में धीरे धीरे बच्चे बढ़ते जा रहे थे | कक्षा ५ में ही हमारे स्कूल में पहली बार जनरेटर की धड़ धड़ सुनाई पड़ी और स्कूल के बहार भेलपुरी वाले का ठेला भी लगना शुरू हुआ |

जो पेड़ मैंने अपने बचपन में छोटे छोटे से देखे थे वो भी मेरे साथ बड़े हो रहे थे | फाटक के पीछे ही जहाँ मोटर पंप का ब्लॉक था वहीँ पर एक छोटा सा नीम का पेड़ लगा हुआ था जो अब मेरी ही तरह ६ वर्षों में लम्बा और ऊँचा हो चला था | मुझे इस पेड़ पर बहुत प्यार था क्यूंकि ये मेरा सबसे पुराना  दोस्त था | जब भी इंटरवल में मौका मिलता या गेम्स पीरियड (शनिवार ) में खाली समय मिलता तो मैं इस पेड़ के नीचे जरूर पत्थर पर बैठ जाता था |

४)

स्कूल की जहाँ शुरुआती ईमारत थी उसके पीछे एक छोटा सा गलियारा था और गलियारे के चारदीवारी के पार छोटी छोटी क्यारियां थीं जहाँ कनेर के वृक्ष लगे थे | इसमें उगने वाले पीले पीले फूल ही हम तोड़कर अपनी क्लास टीचर को देते थे | वो भी बच्चों का प्यार समझकर उन्हें बालों में लगा लिया करती थीं | इसी क्यारी में कई बार मैं लंच टाइम में चला जाता था (टीचर की आँख से हटकर ), मैं हमेशा सोचता की कभी इस क्यारी को पार कर बिना बताये घर भाग जल्दी चला जाऊं पर मार के डर से कभी ऐसा नहीं कर पाया |

मेरे साथ साथ मेरा स्कूल भी बढ़ता चला गया, पहले हिंदी माध्यम की अलग ईमारत बानी फिर इण्टर तक की कक्षाओं हेतु पुरानी ईमारत के पीछे नए कमरे बनाये गए | मुझे बहुत ख़ुशी होती थी सबसे यह बताते हुए की किस तरह से मेरा स्कूल बड़े स्कूलों की तरह बड़ा बनता जा रहा है | पहले मुझे लगता था शायद मुझे यह स्कूल बीच में छोड़ना पड़े , पापा ने कई बार बार मुझसे कहा भी की तुम्हारा एडमिशन किसी बड़े स्कूल में करा देते हैं पर मैं अपने पुराने स्कूल से रिश्ता नहीं तोडना चाहता था इसीलिए किसी न किसी तरह से मैं इसी स्कूल में रह जाता था |

स्कूल की ईमारत बड़ी हो चुकी थी और वो पेड़ भी जिन्होंने मेरे साथ ही इस स्कूल में प्रवेश किया था। मैदान के बगल में लगे शहतूत और आम के पेड़ अब बड़े हो चुके थे , जब मैंने १०वीं कक्षा में प्रवेश किया तब खुद लक्ष्मीकांत जी ने  हम बच्चों के लिए शहतूत बटवाये थे | समय का ये पहिया घूमते घूमते ऐसे ही बढ़ा और अपने साथ श्री लक्ष्मीकांत जी की धर्मपत्नी को ले गया | उस दिन स्कूल में जब छुट्टी हुई तो मैं भी दुखी था क्यूंकि पिछले १० सालों से मेरा और उनका साथ था | मैंने कभी अपनी दादी  को नहीं देखा था पर उनको देख कर एहसास होता की दादी अपने पोतों को कितना प्यार करती होंगी |

११वीं  में कई नए दोस्त बने, इनमे से कुछ तो आजतक साथ हैं | 























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