पापा तुम कहाँ हो

जागे में भी सोया ,सपनों मे भी खोया खोया कहीं वो खोजता है "पापा तुम कहाँ हो".यादें तो अच्छी हैं पर यादों का नशा बुरा फिर भी वो वही प्रश्न पूछता रहा . मंजूर नही पापा को भी की लाडला उनको खोजता फिरे और खुद गुमशुदा रहे . आखिर जवाब आ ही गया और पापा बोले:

में कहीं नही गया
तुम्हारे पास ही तो हूँ,
अपने अंदर झांक कर देखो,
मुझे ही पाओगे,

पैदल चलते देखना,
अपने हाथ में मेरा हाथ पाओगे,
चिलचिलाती धूप से बचाते तुम्हें
मेरा भीगा गमछा अपने ऊपर पाओगे,

आराधना जब करना तुम देखना
अपनी आवाज में मेरा ही सुर और स्वर पाओगे
थक के चूर हो जब लेटना तुम,
मुझे पंखा डुलाते पाओगे ,

जब ठंड से ठिठुर अचल होना तुम
खुद को मेरे सीने में लिपटा पाओगे,

कभी पतंग उड़ाते
कभी क्रिकेट खेलते
अपने आस पास देखना तुम
मुझे वहीं हंसता पाओगे.

अकेले नही हो तुम भइया,
मेरे शरीर को न सही ,
मेरे विचारों को
मेरे संस्कारों को,
सदा अपने साथ पाओगे.

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