Vrindavan Trip 28-29 January 2023

 

28-29 January 2023

इस बार अपनी एनिवर्सरी के लिए हम वृंदावन गए। बहुत दिनों से इतना थके हुए थे की सोचा कहीं भगवान के पास थोड़ी देर के लिए रह आएं। दिल्ली के पास मथुरा है तो वहीं जाना सही लगा, जनवरी का प्रस्थान शुरू हो चुका था तो गाड़ी से जाना ही तय किया क्योंकि धुंध अब कम थी।

पहले मुझे लगा की वृंदावन हम क्यों जाएं या फिर सब लोग क्यों वृंदावन जाते हैं, 2016 में जब मैं पहली बार वहां गया था तो ऐसा कुछ भी नही लगा था की यहां लोग क्यों आते हैं। बांके बिहारी जी का मंदिर देखा था, जन्मस्थली देखी थी, फिर 2018 में और भी कई मंदिर, कंस का महल और बाकी जगहें देखी थीं, पर कुछ खास तो लगा नहीं। हां चौक-चौक पर किसी न किसी नाम पर दक्षिणा मांगने वाले बहुत से बाबा जरूर देखे थे। इस बार भी यही सब ख्याल थे मन में की आखिर मथुरा जाएं तो क्यों वृंदावन और बांके बिहारी क्यों। फिर सोचा चलो पास में ही हैं दर्शन कर ही आयेंगे, इतने लोग आते हैं कुछ तो होगा ही।

इसके पहले एक बात बताता हूं, कभी आपने कोई सुंदर महल देखा है या कोई सुंदर कलाकृति देखी है जिसमे आपको कुछ भी खास न लगा हो, पर जब किसी गाइड या अन्य व्यक्ति ने उसके बारे में कुछ बताया और तब आपको उसकी विशेषता नजर आई तो आपका पूरा दृष्टिकोण ही बदल जाता है। यही कुछ मेरे साथ होने वाला था।

एक्सप्रेस वे पर मथुरा वाले मोड़ पर मैं शीतल और  मिट्ठू थोड़ा हाथ मुंह धोने के लिए निकले और वहां पे लगा की हां बसंत का आगमन हो रहा है, पीले पीले फूल से वो जगह भरी हुई थी। फिर वहां पे जब शीतल मिट्ठू के साथ बाहर घूम रही थी तो मैने सोचा चलो इस मंदिर के इतिहास के बारे में कुछ पढ़ते हैं , इंटरनेट पे खोजबीन शुरू की और एक से एक बढ़कर तथ्य मिले। ये कथा मिली की कैसे स्वामी हरिदास जी ने कृष्ण राधा के युगल स्वरूप का दर्शन पाया और फिर उनसे इस मूर्ति की मांग की, यह मूर्ति इतनी अद्भुत है की लोग कहते हैं की एक राजकुमारी इसे देखकर मोहित हो उठी थी। किस्से कहानियां इंसान बनाते ही इसलिए हैं की भगवान को थोड़ा बढ़चढ़ कर दिखाया जाए। इसमें कुछ नया नहीं था।

फिर और भी लोगों के बारे में पढ़ा की कैसे अन्य लोग भी ठाकुर जी के दर्शन से वृंदावन में ही बस गए। कहते हैं ज्यादा देर बांके बिहारी को देख लो तो उनके मुग्धता रस में को जाओगे। मैने सोचा की प्रयत्न करके देखते हैं की ऐसा होता भी है या नही।

इस ढाबे से चलकर जैसे ही हम वृंदावन की मुख्य सड़क पर आए, तो पता नही क्या था जो मुझे कुछ अलग लगा। जो कथाएं अभी अभी पढ़ीं थी उनका कुछ कुछ असर मन पर होने लगा, कुछ कुछ बातें मन में उमड़ घुमड़ रही थीं। खैर वो बाद में बताएंगे अभी गाड़ी को आगे बढ़ाते हैं । अब वृंदावन में घुसते ही लगने लगा की अरे ये तो कृष्ण की भूमि है, पर पिछली बार ये ऐसी क्यों न लगी थी। धीरे धीरे आगे बढ़ते गए और मेरे मन में  वसंत की हवा के रस मन में घुल रहे थे, इस सोच में मन बह रहा था की अरे कृष्ण मुझमें भी तो है, वो बचपन में को अठखेलियां करता मैं था वह भी तों कृष्ण था, वह कहीं खो गया, पर शायद यहां उसके होने का एहसास है। हवा की महक दिल्ली से तो निश्चित रूप से अलग थी, कुछ बसंत की महक थी और कुछ यहां की रज की। इस बार कुछ अलग सा था।

खैर एक घंटे जाम में फंसकर हमने एक पार्किंग में गाड़ी पार्क की और ई रिक्शा से मंदिर तक जाने का निश्चय किया। मंदिर में ई रिक्शा मुख्य सड़क से होकर फिर कुछ कच्चे रास्ते से होते हुए बांके बिहारी धाम पहुंचा। वहां उतरकर कुछ दूर पैदल चले और फिर पेड़ों की कई दुकानों में से एक को चुनकर प्रसाद खरीदा। एक कच्चे मकाननुमा जगह में चप्पल आदि जमा कर मंदिर की ओर रुख किया। भीड़ बहुत थी पर इस बार लगा की हम केवल दर्शन नहीं करेंगे बल्कि ये जानने का प्रयत्न भी करेंगे की ये कहानियां सच्ची हैं या झूठी। क्या पागलपन है जो लोगों कों खींच लाता है।  

फिर कुछ गलियों से होते हुए हम बांके बिहारी मंदिर पहुंचे, यहां पर कुछ देर के लिए दर्शन हेतु पर्दे खोले जाते हैं और फिर बन्द कर दिए जाते है. कहा जाता है कि यदि कोई देर तक बांके बिहारी को निहार ले तो वो वृंदा वन में ही बस जाता है. पिछली बार जब मैं आया  तब बहुत भीड़ थी और बस यही प्रयत्न था की हाथ जोड़ कर निकलें। इस बार मेरा मन अलग था , मैं मंदिर के कपाट के पास चढ़ गया, सब लोग राधे राधे जप रहे थे, मैं भी जपने लगा। बड़ी देर तक इंतजार के बाद परदे खुले, मैंने भी बांके बिहारी को जी भर के देखा , फिर अपने पीछे वालों को भी मौका दिया। इस बार सच में दर्शन हुए, ऐसा लगा की स्वयं ईश्वर ने कहा जैसी छवि मेरी अपने मन में बनाओगे, वैसा ही मुझे पाओगे। मुझे नकार दो, मैं कुछ भी नहीं और कृष्ण कह कर अपना लो देखो मैं कण कण में रज रज में दिखूंगा।

इस बार बांके बिहारी से निकला तो मन बहुत खुश था, शायद इसलिए की मेरे मन में कोई शिकायत नहीं थी, न भगवान के लिए, न भीड़ के लिए और न ही मैंने मंदिर को सत्य असत्य के तराजू में तौला। अच्छा लगा जो वो अपना लिया। शांति की तलाश में मंदिर आया था, वो तो मन में ही मिली और बस बांके बिहारी ने उसे आनंद बना दिया। अब मंदिर से निकलकर वृंदावन मेरे लिए पूरी तरह से बदल गया था, पिछली बार का सब लेखा जोखा शिकायतें मिट चुकी थीं और एक नया वृंदावन मानस पटल पर लिख रहा था।

बाहर निकलकर चप्पल आदि लेकर हम पुनः बाजार की ओर लौटे, लौटने का मार्ग अलग था सो पूरे मंदिर पथ की जैसे सहज ही परिक्रमा कर ली। मिट्ठू बाबू ने एक दूरबीन भी ले ली और इधर उधर बंदरों को ताकने लगे। फिर एक दुकान में बैठकर हमने वृंदावन की चाट खाई और थोड़ा जलपान किया। आज स्वाद भी अलग था।

वहां से निकलकर हमने फिर एक e riksha किया और उस पार्किंग के तरफ चले जहां गाड़ी खड़ी की थी। पार्किंग चार्ज १०० रुपए था, जोकि एक घंटे के हिसाब से कुछ ज्यादा था, वहां थोड़ी बहस भी हुई पर क्या करते शायद पार्किंग वाले भी मजबूर थे क्योंकि जमीन का किराया बहुत ज्यादा था। हल्के गुस्से में मैं होटल पहुंचा वहां भी एक कर्मचारी को थोड़ा डांट दिया, क्योंकि वो कमरे दिखाने में आनाकानी कर रहा था। जो दूसरा कमरा बाद में दिखाया वो भी मुझे पसंद नही आया और शीतल ने वही पहले वाला कमरा पसंद किया जो सड़क के पास था । आखिर में वो कर्मचारी फिर से समान लेकर पहले वाले ही कमरे में हमे छोड़ गया। मुझे भी लगा की शायद गलत ही डांट दिया उसने अपनी तरफ से अच्छा कमरा ही दिखाया था।

खैर थोड़ी देर विश्राम के बाद हम लोगों ने इस्कॉन मंदिर दर्शन के लिए पग पग ही प्रस्थान किया। लगभग ४ बजे का समय था और वृंदावन सूर्य देव को संध्या प्रणाम कर रात्रि का स्वागत करने की तैयारी में लग चुका था। इस्कॉन मंदिर में भीड़ थी पर बहुत ज्यादा नहीं, हम मुख्य प्रांगण में पहुंचे फिर भजन सुनने के लिए वहीं बैठ गए। मंजीरे और ढोलक के साथ मधुर भजन पूरे वातावरण को आनंददाई बना रहे थे। भजनों में ’ हरे रामा हरे कृष्णा ’ के स्वर  जिस अनुभूति का आनंद दे रहे थे वो मैं लिख नही सकता, उसको केवल महसूस ही किया जा सकता है। भजनों में स्वरों की ऊहापोह के मध्य भी एक शांति थी, जिसमे हमारे बाल गोपाल भी शयन करने लगे। मिट्ठू  मेरी गोद में सिर रख कर वहीं फर्श पर ही बिछी दरी पर सो गए। उनको देख कर भी लग रहा था की आज तो नींद बहुत मीठी आई है।

वहां मंदिर प्रांगण में आए अन्य भक्त भी नृत्य में स्वत: लीन हो गए थे। एक गायक के बाद दूसरे गायक ने जगह ली, पर ये गायक भारतीय न होकर विदेशी थे, शायद यूरोप या अमेरिका के, पर उनके कंठ से भी निकले भजन वातावरण में वही पवित्रता ला रहे थे जो उनके पहले थी। शायद कृष्ण का नाम ही भजन को आनंददाई बना देता है। लगभग एक घंटे वहां बैठने और भजन में भाव विभोर होने के बाद हम मंदिर से बाहर निकले। वहां पर प्रसाद में बंट रही खिचड़ी खाई, वह भी बहुत स्वादिष्ट थी, निर्मल , स्वच्छ और मन शांत करने वाली। बाहर निकलकर हमने चाय पी, और फिर प्रेम मंदिर जाने का निश्चय किया।

वृंदावन की खूबसूरती उसकी संस्कृति में भी रच बस गई है, हर एक व्यक्ति आपको वहां राधे कह कर संबोधित करेगा। आपसे खाने के पहले कोई पैसे नही लेगा और अगर पैसे रह गए तो विश्वास कर लेगा की आप बाद में दे जायेंगे। ये बात मुझे बहुत अच्छी लगी की कान्हा के नाम पर आज भी विश्वास यहां पर हर जगह दिखता है। वृंदावन सहज है मधुर है और अपने परिवार जैसा ही है। इस दिन समझ में आया की क्यों भारत ही नहीं दुनिया भर के लोग यहां अशांत मन में आशा लेकर आते हैं और फिर यहीं बस जाते है। कितनी ही वृद्धाएं यहां कृष्ण की शरण में मन लगाए रहती हैं, कुछ मजबूरी होगी आने में पर बसने में तो शायद वृंदावन का सुकून ही होगा जो उन्हे यहां बांधे रखता है।

प्रेम मंदिर में हमने मंदिर दर्शन किए और साथ साथ प्रांगण की सुंदर झांकियों का भी अवलोकन किया। गोवर्धन हाथ में उठाए कृष्ण मानो ये कह रहे थे की चिंता मत करो, जब विपदा आएगी और तुमसे नही संभलेगी तो कृष्ण हर असंभव को संभव करेंगे। पर्वत उठाना एक कहानी है पर संदेश यही है की अगर तुम विश्वास करो तो कृष्ण हर चमत्कार कर दिखाएंगे। प्रेम मंदिर में फव्वारों पर भी राधा कृष्ण की आकृति नृत्य कर रही थी, साथ में मधुर भजन संध्या की मनोरमता को अधिक सुंदर कर रहे थे। शीतल ऋतु की रात्रि में भी ठंडी जल फुहार आनंदमय थी।

फिर वहां से निकलकर हमने एक भोजनालय में सात्विक भोजन किया और पैदल ही होटल वापस लौट आए। रास्ते में एक दुकान से कुछ जरूरत का समान लिया, वहां भी राधे राधे का अभिवादन मिला और मिट्ठू से दुकान वाली बहन जी ने पूछा "आपने ठाकुर जी के दर्शन किए"?। उसी समय वहां एक और यूरोपीय महिला भी आईं थीं उन्होंने पूर्णतः हिंदू स्त्री की तरह श्रृंगार किया था, या कहिए की उनसे भी ज्यादा। उनको देख कर ऐसा लगा की सच में वृन्दावन में कुछ तो जादू है तो जहाँ आकर हर स्त्री में एक अलग ही आभा नजर आती है , कण कण में समर्पण और प्रेम दिखता है यहाँ |

अब रात में जब वापस होटल पहुंचे तो देखा की बाहर खड़ी हमारी गाड़ी पर कोई टक्कर मार के चला गया है| इस बात पर फिर मैंने होटल प्रबंधन पर बहुत गुस्सा किया लगभग एक घंटे तक यही सिलसिला चलता रहा| बाद में पता चला की एक इ-रिक्शा निकलते हुए गाड़ी से टकरा गया था|मैं बिलकुल गुस्सा नहीं करना चाह रहा था पर मेहनत से कमाई हुई गाड़ी के लिए दुःख तो हो ही रहा था| खैर इस बात को आगे के लिए टालकर हम लोग सो गए|

अगले दिन सुबह हम गोकुल के लिए निकले और सुबह सुबह की ठण्ड का आनंद ही कुछ और था| गाड़ी में डेंट आया था पर वो मैंने अपने मन पर नहीं आने दिया था | मन में ये विचार आया की किसी ने सोचकर तो टक्कर मारी नहीं होगी, आखिर ये वृन्दावन है, और यह भी हो सकता हो की किसी कारणवश वह जल्दी में कहीं जा  रहा होगा, किसी बीमार को लेकर जा रहा हो, बहुत से कारण हो सकते हैं , मैंने इसीलिए गुस्सा छोड़ दिया| पहले सोचा था की जितना गाड़ी का खर्चा होगा वो क्लेम करूँगा होटल से , फिर लगा कृष्ण की भूमि आकर यह तो नहीं कर सकते| जहाँ प्रेम हो विश्वास हो , वहां ये छोटे मोटे नुक्सान सहर्ष ही स्वीकार हैं मुझे| जीवन में इससे पहले न किसी से ऐसा क्लेम किया है तो अभी भी नहीं, गाड़ियाँ रस्ते में चलती हैं तो थोडा बहुत टक्कर तो स्वाभाविक ही है, समुद्री जहाज भी तो समुद्र में टूटते ही हैं , वहां कौन भरपाई करेगा|
कभी कभी सही होने से बेहतर है खुश रहना और मैं अभी खुश ही रहना चाहता था| गाड़ी कुछ हजार रुपयों में सही हो जाएगी पर मन को सही करना मुश्किल है, इसलिए मैंने हर रंज गम जो छोड़ दिया , आखिर कृष्ण की नगरी है , यहाँ कुछ गलत भी हुआ तो शायद इसीलिए की मुझे गुस्सा छोड़ कर आना चाहिए था| सन्देश यही था की गुस्से को त्यागों तभी दर्शन मिलेंगे, मन को शांति खुद से मिलेगी बस अपने आप को संयम में रखो| मैंने भी सोचा चलो यही कृष्ण की मर्जी और फिर हम गोकुल की ओर चल दिए|

रास्ते में हमने दुर्गा माता की बहुत ही ऊँची (लगभग ३ मंजिला) मूर्ती देखी| ये वैष्णो माता मंदिर था जो गोकुल के रस्ते में था, हमने वहीँ गाड़ी रोकी और मंदिर दर्शन के लिए चले गए | बहुत ही भव्य और सुन्दर मंदिर था, यहाँ पर माता वैष्णों देवी की तरह गुफाएं बनी थी जिनमे माता के ९ रूपों का दर्शन था और छत पर माता की विशाल मूर्ती थी| नीचे छोटे छोटे सरोवर थे जिनमे माँ गंगा और यमुना की मूर्तियाँ थी| मंदिर में एक संग्राहलय भी था जहाँ मंदिर निर्माण का इतिहास लिखा हुआ था, माता की विशालकाय  मूर्ति बनाने में जो उद्यम लगा वो यहीं से समझ आया| सच में बहुत ही सुन्दर मंदिर है ये| 

फिर मंदिर के बाहर हमने वृन्दावन की प्रसिद्ध कचौड़ी का नाश्ता किया, सुबह सुबह तीखा खाना थोडा अजीब लग रहा था पर फिर लगा चलो प्रसाद के रूप में यह भी लेकर देख लेते हैं| हमने पेट भय कचौड़ी खायी और चाय पी , मन और भी प्रसन्न हो गया तब फिर माता को नमस्कार करके हम गोकुल रमण रेती की ओर चल पड़े|रस्ते में हलकी बारिश से मौसम और भी सुहावना हो गया था, जब हम गोकुल की गलियों से गुजरे तो लगा कितना सुन्दर रहा होगा ये गोकुल कृष्ण के समय में, चहुँ ओर ऐसी ही हरियाली रही होगी, आज से कहीं ज्यादा और जब वर्षा गोकुल को नहलाती होगी तो आज की तरह ही पूरी हवा कितनी सुगन्धित और पावन हो जाती होगी| 

रमण रेती पहुँच कर हमने पाया की मंदिर बंद था परन्तु मंदिर से ज्यादा तो हमें वो रेत देखनी थी जहाँ कहते हैं की कभी कृष्ण ने अपना बचपन बिताया था| अब इस कथा को भी सत्य असत्य में बाँट सकते हैं पर मैंने कहा चलो सत्य मान कर ही देख लें , कृष्णा की नगर में यदि कृष्ण को माना है तो इस रेत में भी चलो उसे खोज कर देखें | पास में ही एक बहुत विशाल सरोवर था , उसके पास बैठकर हमने काफी देर तक विश्राम किया और उस शांति को मन में बसाया , जिंदगी की इस भागदौड़ में जहाँ भी शांति के कुछ पर मिले तो उन्हें सहज ही स्वीकार कर लेना चाहिए| कुछ विलम्ब आगे पीछे हो भी जाये तो भी मलाल नहीं होगा क्योंकि ये शांति अमूल्य है| सरोवर से आती ठंडी हवा और सूर्य की माध्यम रौशनी का संयोग कितना सुखदायी होता है , यहाँ हमने सविस्तार महसूस किया| पहले जब कहीं हम जाते थे तो मेरी और शीतल की खटपट जरूर होती थी , पिछली बार वृन्दावन आने में भी हुई थी पर अब हम दोनों राधा  कृष्ण की  तरह  सौहार्द  से इस समय को जी रहे थे| 

फिर लौटने के समय हम जब रेत पर से गुजरे तो मिट्ठू को वहां अलग ही नए नए खेल सूझने लगे| रेत में लगभग १ घंटे तक और बच्चों के साथ मिट्ठू खेलते रहे , उनको देख कर पूरा यकीन हो गया की कृष्णा भी ऐसे ही खेले होंगे या फिर ये कहो की आज स्वयं बाल गोपाल हमारे सामने खेल रहे हैं|हमारे बाल गोपाल स्वयं ही लीला दिखा रहे हैं , इससे अच्छा दृश्य कहाँ मिलेगा| मन तो नहीं कर रहा था वहां से विदा होने का परन्तु आगरा में एक समारोह में भी जाना था| लगभग २ घंटे वहां रहने के बाद हम बाहर निकले, सामने ही हिरणों के बाड़े हैं वहां हिरणों को घास और अनाज खरीद कर हम लोगों ने खिलाया, इसमें भी बड़ा सुकून मिलता है|

फिर जहाँ गाड़ी पार्क की थी वहां पर ही फल चाट और आलू चाट भी खायी , दोपहर के खाने के जगह हमने यही खाना पसंद किया| दिल्ली में कभी चाट आदि नहीं खाते , पर यहाँ का स्वाद ही अलग था , गोकुल गाँव की मिटटी में उसकी महक के साथ|अब वृन्दावन और गोकुल से विदा लेने का समय था| जो भाव वृन्दावन में कदम रखने पर मन में थे, जो भी शंकाएं थी अब सब बदल चुकी थीं | इस बार का वृन्दावन एकदम अलग था क्योंकि शायद बालगोपाल हमारे साथ स्वयं ही थे और उससे भी ज्यादा शायद ये की मैंने ये जान लिया था की भावना तो मन से होती है |
जब कहीं जाओ तो उसे स्वीकार करो, शिकायत नहीं प्रेम करो , उसको जानो, उसको मानो , वहां पर कमियां निकालने की जगह उसकी सुन्दरता को देखो, कोई तुलना नहीं करो बस उसी में रम जाओ| जब किसी जगह को बाहर से देखो उसमे कमियां नजर आएँगी, पर एक बार उसे अपना मान कर देखो, उसके होकर देखो, फिर असल खूबसूरती निकल कर आएगी| बस यही सीखा मैंने इस बार वृन्दावन में| अपने अन्दर के कृष्ण को फिर से जिया मैंने , गुस्से से अलग कर खुद को देखा मैंने, क्रोध सच में दुसरे से ज्यादा अपने मन को ही हानि पहुंचता है , इस्पे विजय कर आनंद के द्वार खुलते हैं| आस्था यही तो सिखाती है| आस्था पवित्र होना सिखाती है, एक दुसरे से प्रेम करना सिखाती है , हमें जिसने बनाया उसके साथ उसके जैसा बनकर जुड़ना सिखाती है|  

आस्था अफीम नही है आस्था छलावा नही है, ये पाखंड नही हैं न ही ये दिखावा है, ये विश्वास है, ये प्रेम है ,ये संसार की डोर है। लोग भले ही इसके नाम पर ठगी कर लें पर मन का संतोष जो आस्था में हैं वो कोई ठग नही सकता। आस्था के समुद्र से कोई कुछ बूंद निकाल भी ले निज स्वार्थ के लिए पर इससे समुद्र नही सूखते। मां की ममता देखी है, वो आस्था का मूर्त रूप है। कृष्ण, राम, अल्लाह, ईशु जिस नाम को भी ले लो आस्था जहां है वहां पवित्रता अपने आप ही जगह ले लेगी। कहते है न एक दिया अंधेरे को खत्म कर देता है वैसे ही आस्था हर बाधा निराशा, अहंकार, विकार को खत्म कर सकती है। बस इसे सही रूप में अपनाना और समझना जरूरी है।


आशा है जब आप वृन्दावन जाएँ तो इसी सुख के साथ इसी आनंद के साथ वापस आयें|

जय श्री कृष्ण|

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